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लोकसभा उपचुनाव में अगर हुई हार तो,अधूरा रह जाएगा योगी का राष्ट्रीय नेता बन्ने का सपना

उत्तरप्रदेश की गोरखपुर संसदीय सीट पर आगामी 11 मार्च को उपचुनाव होने है जिसे लेकर प्रदेश में सियासी हलचल जोरों पर है जहाँ एक ओर बीजेपी ने उपेन्द्र शुक्ला को अपना उम्मीदवार बनाया है तो वहीँ दूसरी औरसमाजवादी पार्टी ने प्रवीण निषाद को अपना प्रत्याशी घोषित किया है इसके साथ ही बहुजन समाज पार्टी ने भी प्रवीण निषाद को ही समर्थन देने का फैसला लिया है|गौरखपुर उपचुनाव को अगर योगी आदित्यनाथ के गौरव की लड़ाई कहा जाए तो यह हरगिस गलत नहीं होगा, गोरखपुर सीट से योगी आदित्यनाथ पांच बार सांसद रह चुके है और मुख्यमंत्री बन जाने के बाद योगी आदित्यनाथ ने यह सीट छोड़ दी थी। जहाँ एक और यह सीट उनकी प्रतिष्ठा से जुडी हुई है तो वही दूसरी और सपा-बसपा का गठबंधन भी योगिआदित्य्नाथ के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है|अगर दोनों ओर की राजनीतिक रणनीतियों की चर्चा करे तो इस सीट पर बीजेपी हमेशा की तरह जहां हिंदुत्व के मुद्दे पर ही चुनाव लड़ रही है, वहीं सपा-बसपा की दोस्ती वाले खेमे ने निषाद समाज से प्रत्याशी चुनकर जातीय समीकरण बिठाने की कोशिश की है|गोरखपुर लोकसभा सीट के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि यहां हमेशा गोरखनाथ मठ के प्रत्याशी बड़े अंतर से जीतते रहे हैंजिसका साक्षात् उदाहरण स्वयं हिंदुत्व का बड़ा चेहरा माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ है जो साल 1998 से हिन्दूत्व का पांसा फेंककर बड़े अंतर से अपनी जीत दर्ज करते आये है| परन्तु इस बार उनकी जीत पर संकट के बदल नजर आते है जिसके मुख्य कारण कुछ इस प्रकार है

गोरखपुर की राजनीति में गौरखनाथ मठ का हमेशा से ही निर्णायक प्रभाव रहा है और बीते 29 सालो से लोकसभा सीट पर मंदिर का कब्ज़ा रहा है अगर साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पड़े वोटों पर नजर डालें तो यहां योगी आदित्यनाथ को 538604, सपा की राजमति निषाद ने 226216, बसपा के रामभुआल निषाद ने 176277| गौर करने वाली बात यह है की दोनों को मिले मत को अगर मिला भी दिया जाए तो भी वो योगी को हारने में अक्षम है|लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि इसमें काफी वोट ऐसे होंगे जो योगी और योगी के गौरखनाथ मठ से जुड़े होने पर मिले होंगे, परन्तु इस बार बीजेपी के प्रत्याशी उपेन्द्र शुक्ला का गौरखनाथ मठ से कोई सरोकार नहीं है गोरखपुर की राजनीति में उपेंद्र शुक्ल कभी भी योगी के गुड बुक में सामिल नहीं रहे बल्कि वर्ष 2005  में कौड़ीराम विधानसभा के उपचुनाव में वह योगी पर टिकट कटवाने का आरोप लगाते हुए भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ गए थे| इतना ही नहीं योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक इतिहास के पन्ने अगर पलटे तो वे सदेव से क्षत्रिय जाती को बढ़ावा देते आये है परतु इस बार भाजपा प्रत्याशी का ब्राह्मण होना भी योगी की क्षत्रिय राजनीति को संकट में डाल सकता है|

2017 के विधान सभा चुनावों की अगर बात जो समय की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है तो गठबंधन से एक हुई पार्टिया सपा और बसपा का वोटबैंक 4 विधानसभा सीटो पर भाजपा के वोटबैंक से ज्यादा था यानी 2017 में गोरखपुर पर मोदी लहर का कम प्रभाव देखने को मिला था|प्रचार हमेशा से ही चुनावी नतीजो में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते नजर आये है जिसके कारण हर नेता चुनाव प्रचार समय में अपनी सक्रीय भूमिका दर्ज कराता है लेकिन हाल ही में खबर आई थी कीउपेंद्र गंभीर रूप से बीमार हो गए है और उन्हें लखनऊ पीजीआई अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था और वे 5 दिन के बाद चुनाव प्रचार में वापस लौटे थे ऐसे में बीजेपी के प्रत्याशी उपेन्द्र शुकला का खराब स्वाथ्य भी प्रचार-प्रहार फैक्टर में बाधा बन सकता है|उपेन्द्र शुक्ल को योगी आदित्यनाथ के प्रतिद्वंदी और वर्तमान में केंद्रीय वित्तराज्य मंत्री शिवप्रताप शुक्ल का नजदीकी माना जाता है| शिव प्रताप शुक्ल भी पूर्व में योगी की नाराजगी झेल चुके हैं| जिसके बाद वह भाजपा में हाशिए पर चले गए| केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद अचानक उनका भाग्योदय हुआ और पहले उन्हें राज्य सभा भेजा गया और अब वित्त राज्यमंत्री बना दिया गया| उनका कद बढ़ाए जाना भी बीजेपी की बैलेंस पॉलिटिक्स का हिस्सा माना जा रहा है ताकि योगी के उभार से ब्राह्मण भाजपा में अपने को उपेक्षित न समझें और योगी के गढ़ में एक समानांतर सत्ता केंद्र बना रहे|

अब अगर बात करे समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी प्रवीण कुमार निषाद की जो समाजवादी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा करने वाली निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के पुत्र हैं। गोरखपुर सीट पर कुल मतदाताओ की संख्या 19 लाख है जिसमें प्रथम स्थान पर निषाद है जिनकी संख्या साढ़े चार लाख के करीब है| इसके बाद मुस्लिम है जो संख्या में औसतन चार लाख तीस हजार है| तृतीय स्थान पर दलित हैजो की करीब साढ़े तीन लाख है| अंतिम स्थान पर यादव आते है तो तकरीबन संख्या में 2 लाख है| गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र में निषाद बिरादरी के करीब साढ़े चार लाख मतदाता है जो निश्चित तौर पर प्रवीण निषाद की ओर जाते नजर आते है इसके साथ ही पीस पार्टी का साथ मिलने पर मुस्लिम मतदाताओ( 4.3 लाख) का साथ मिलने की भी आशंका जताई गयी है| दलित वोट जो पहले बंटा हुआ था लेकिन अब गठबंधन के बाद इसका भीं बड़ा हिस्सा निषाद उमीदवार की झोली में जा सकता है| जिसके बाद समाजवादी पार्टी की यह समीकरण की राजनीति पारदर्शी रूप से हिट होती जान पड़ती है| गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनाव में सपा को 28 प्रतिशत और बहुजन समाजवादी पार्टी को 22 प्रतिशत वोट मिले थे पच्चास तो जिनको अगर जोड़ा जाए प्रतिशत वोट  हो जाता है ऐसी स्थिति में बीजेपी के लिए उपचुनाव में सपा के प्रत्याशी को हराना बेहद मुश्किल हो जाएगा|

 

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बहरहाल, देखने वाली बात यह होगी की गौरखनाथ मठ के महंत योगी आदित्यनाथ का हमेशा से कारगर रहा हिंदुत्व कार्ड और गौरखपुर राजनीति में विशेष महत्त्व रखने वाला मठ प्रभाव अपने ही ग्रहनगर में इस बार कितना कारगर साबित होता है या फिर सपा-बसपा का गठबंधन तीन दशको से लहरा रहे जीत के परचम पर पूर्ण विराम लगाकर इतिहास को बदलने में सफल हो जायेगा|

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