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ATTENTION : आधार से एक बार जानकारी गई, तो जिंदगी भर के लिए खुला जाएगा राज़।

ATTENTION : आधार से एक बार जानकारी गई, तो जिंदगी भर के लिए खुला जाएगा राज़।

एक समय था जब हर ज़रूरी काम के लिए आधार अनिवार्य कर दिया था। लेकिन आज देश में आधार को लेकर ही सवाल उठ रहे है। अब देखना है की क्या वाक़ई आधार कार्ड लोगो के लिए सुरक्षित साबित हुआ या फिर नाकाम।

‘AADHAAR’ के AADHAAR पर अदालत तक में उठे तमाम शोरगुल में तरह-तरह की आशंकाएं जताई गईं। याचिकाकर्ता ने डाटा की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए और इसे निजता का उल्लंघन भी करार दिया। लेकिन UIDAI  ने इसके बचाव में सारे घोड़े खोल दिए। बहरहाल, समाज के लिए इस अहम मुद्दे पर बेहद अहम सवाल उठाते कुछ लेखों के संपादित अंश हम यहां लगातार आपके सामने रख रहे हैं। आज की कड़ी में पेश है मल्टीमीडिया टेक्नोलॉजी एंड एंबेडेड सिस्टम के क्षेत्र में सक्रिय बेंगलुरू स्थित इंजीनियर विश्वनाथ एल का लेख:

बाहरी साधनों और माध्यमों से बायोमीट्रिकस की नकल करना कितना आसान है, यह सिद्ध करने के लिए कई उदाहरण हैं। जैसा कि पहले बताया गया है कि उत्तर प्रदेश घोटाले में, गिरोह ने सिस्टम में लॉगइन करने के लिए अधिकृत नामांकन ऑपरेटरों के क्लोन किए गए फिंगरप्रिंट का इस्तेमाल किया था (Mail Today 2017)। एक अन्य उदाहरण में, मुंबई में छात्र रेसिन (राल) फिल्मों पर उंगलियों के छाप लगाकर अपने कॉलेज में बायोमीट्रिक उपस्थिति प्रणाली को चकमा दे पाने में सफल रहे थे (Hindustan Times 2017)।

बायोमीट्रिक्स की नकल करना कोई मुश्किल काम नहीं है। लोगों के डेटा की बड़ी आसानी से चोरी हो सकती है। पहचान निजता के अधिकार का मामला है और इसमें किसी तरह की अनिश्चितता के लिए कोई जगह नहीं है।

शोधकर्ता ‘मास्टर प्रिंट्स’ को संश्लेषित करने तक में सक्षम रहे हैं जिससे संभावित रूप से दो-तिहाई फोनों को अनलॉक किया जा सकता है (Newyork Times 2017)। सैमसंग गैलेक्सी एस-8 फोन पर लगे आंखों की पुतलियों के स्कैनर (Aairis Scanner) को साधारण उपकरणों जैसे कि एक इन्फ्रारेड कैमरा और एक संपर्क लेंस की मदद से हैक कर दिखाया गया था (Fobs 2017)।

ATTENTION : आधार से एक बार जानकारी गई, तो जिंदगी भर के लिए खुला जाएगा राज़।
Source: AC Buzz

जब एक्सिस बैंक, सुविधा इन्फो सर्व और ईमुद्रा जैसी कंपनियों द्वारा अपने पास संग्रहित उंगलियों की छाप द्वारा AADHAAR  सत्यापन का मामला सामने आया तब पहली बार UIDAI  ने प्रतिक्रिया स्वरूप AADHAAR  सत्यापन को सुरक्षित करने की कोशिश की। जो सुरक्षा उपाय शुरू किए गए थे-उसमें सत्यापन मशीन का पंजीकरण और ली गई बायोमीट्रिक छवि का एनक्रिप्शन अनिवार्य था। लेकिन एनक्रिप्शन सॉफ्टवेयर में होने के कारण, संग्रहित बायोमीट्रिक्स का उपयोग करने की संभावना अभी भी बनी हुई है। उससे बड़ी सच्चाई यह है कि इन कम लागत वाली विधियों में से कोई भी बाहरी हैक जैसे किराल फिल्म पर उंगलियों की छाप के इस्तेमाल को रोक नहीं सकता है।

इसलिए नियमित रूप से कानून लागू करना ही धोखाधड़ी के खिलाफ एकमात्र विचारपूर्ण तरीका है। AADHAAR  के मामले में सबसे बड़ी कमी यह है कि किसी को यह पता चलने के बाद कि उनके बायोमीट्रिक्स से समझौता किया गया है, फिर भी उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे कि वह अपनी पहचान वापस पाने के लिए कुछ कर पाएं, क्योंकि चाहकर भी बायोमीट्रिक्स को (पासवर्ड की तरह) बदला नहीं जा सकता है। इस तरह, AADHAAR  की पहचान, एक बार भंग होने पर जिंदगी भर के लिए खुला रहस्य बन जाती है। दूसरे शब्दों में, कानून उसे जोड़ नहीं सकता जिसे प्रौद्योगिकी द्वारा तोड़ा गया हो।

AADHAAR  का बैंक खाता खोलने, मोबाइल सिम लेने, इत्यादि जैसे संवेदनशील मामलों में टोकन के रूप में इस्तेमाल व्यक्तिगत और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। सत्यापन के लिए गैर-बायोमीट्रिक साधनों की उपलब्धता से नामांकन के दौरान जाली पहचान को दाखिल करने की संभावना बनी रहती है। विशिष्ट पहचान के लिए, मोबाइल ओटीपी सत्यापन, एक अत्यंत कमजोर सुरक्षा परत है। किसी भी व्यक्ति की AADHAAR  पहचान केवल उसके मोबाइल नंबर को नियंत्रित करके प्राप्त की जा सकती है, जिसे सिम कार्ड क्लोनिंग या सिम स्वैपिंग या यहां तक कि AADHAAR  से जुड़े मोबाइल नंबर को बदलकर किया जा सकता है।

पहचान के साधन के रूप में बायोमीट्रिक्स में विश्वास की कमी को AADHAAR  के शुरुआती दिनों से अनुभव किया गया है। दिसंबर 2009 की रिपोर्ट में, बायोमीट्रिक्स पर UIDAI  की समिति ने भी, बायोमीट्रिक गुणवत्ता और भारतीय आबादी के पैमाने के कारण, बायोमीट्रिक डी-डुप्लिकेशन को लागू करने में आने वाली अप्रत्याशित चुनौतियों को स्वीकार किया। भारतीय परिदृश्य में खराब गुणवत्ता वाली उंगलियों की छाप (फिंगरप्रिंट) की समस्या व्यापक रूप से देखने को मिलती है (फर्स्टपोस्ट 2011)।

आंखों की पुतलियों (आईरिस) पर आधारित सत्यापन 2013 में पेश किया गया था, जब यह स्पष्ट रूप से ज्ञात हो रहा था कि उंगलियों की छाप (फिंगरप्रिंट) आधारित सत्यापन बहुत अविश्वसनीय था। यह उस समय भी था जब आंखों की पुतलियों (आईरिस) सत्यापन तकनीक में कोई मानक उपलब्ध नहीं थे (बिजनेस स्टैंडर्ड 2013)। जैसा कि देखा जा सकता है, वैज्ञानिक अनुसंधान और तत्कालिक प्रबंध मे व्यवस्थाएं एक दूसरे का हाथ थामकर काम कर रही हैं।

ATTENTION : आधार से एक बार जानकारी गई, तो जिंदगी भर के लिए खुला जाएगा राज़।
Source: Enewsroom.in

सबसे बेमेल तथ्य यह है कि पहचान के लिए बायोमीट्रिक्स अनुकूल है, जबकि AADHAAR  कार्यक्रम इसे पहचान के साधन के रूप में उपयोग करने का प्रयास करता है। पहचान और पहचान करना दो अलग क्षेत्र हैं। व्यक्ति के सहयोग के बिना भी पहचान की जा सकती है। बायोमीट्रिक तकनीक फोरेंसिक, आपराधिक जांच, निगरानी इत्यादि जैसे एप्लीकेशन में अपना मूल्यवान योगदान दे सकती है, लेकिन वहां भी तकनीक की सीमाओं की समझ से उस उत्साह को भी नियंत्रित किया जाना चाहिए।

यहां तक कि UIDAI  ने सर्वोच्च न्यायालय को यह भी बताया कि मुख्यत: गलत सकारात्मक मिलान की संभावना के कारण AADHAAR  डाटाबेस के बायोमीट्रिक्स, आपराधिक जांच के उद्देश्यों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। (इंडियन एक्सप्रेस 2014)। दूसरी ओर, पहचान अधिकार का मामला है जिसका व्यक्ति द्वारा प्रयोग किया जाता है। यहां अनिश्चितता के लिए कोई जगह नहीं हो सकती ।

source: NavjiwanIndia

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