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क्या सरकार प्रदर्शनकारियों से नुक़सान की भरपाई करवा सकती है?

क्या सरकार प्रदर्शनकारियों से नुक़सान की भरपाई करवा सकती है?

क़ानून के कुछ जानकार मानते हैं कि सरकार अगर इस तरह की कार्रवाई करती है तो उसे अदालत की देख रेख में होना चाहिए यानी कोई सेवानिवृत जज की निगरानी में जिसे सरकार ‘क्लेम कमिश्नर’ के तौर पर नियुक्त करे.

वरिष्ठ अधिवक्ता विराग गुप्ता कहते हैं कि ये ज़रूरी नहीं है.

उनका कहना है कि सरकारें अदालतों के निर्देशों की व्याख्या अपने अपने तरीक़े से करती हैं. लेकिन इसका कहीं से ये मतलब नहीं है कि जो संपत्ति ज़ब्त कर हर्ज़ाना वसूलने की कार्रवाई की जा रही है वो ग़लत है.

उनका कहना है कि अगर दूसरे राज्यों में हुए प्रदर्शन के बाद वहां की राज्य सरकारों ने प्रदर्शनकारियों से हर्ज़ाना नहीं वसूला, इसका मतलब ये नहीं है कि उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही हो. उनका कहना है कि प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को इसमें कार्रवाई के लिए क़ानून ने अलग-अलग अधिकार दिए हैं.

अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति की बैठक में अध्यक्ष यशपाल मलिक ने वर्ष 2016 के फ़रवरी में हरियाणा में हुए जाट आंदोलन के दौरान मारे गए जाट युवाओं के परिजनों को सरकारी नौकरी की मांग दोहराई.

उन्होंने आंदोलन के दौरान जाटों पर दर्ज़ किए गए सभी मामलों को वापस लेने की मांग करते हुए एक बार फिर से आंदोलन तेज़ करने की धमकी दी.

हरियाणा सरकार के अनुसार इस आंदोलन के दौरान कुल 30 प्रदर्शनकारी मारे गए थे जबकि हिंसा की वजह से राज्य को एक हज़ार करोड़ रुपये से भी ज़्यादा का नुक़सान झेलना पड़ा था. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस हिंसा में जिनकी संपत्ति का नुक़सान हुआ था उन्हें सरकार को 60 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा का मुआवज़ा देना पड़ा था.

हालांकि आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ मामले अदालत में अब भी लंबित हैं, सरकार का कहना है कि इस दौरान हुई संपत्ति के नुक़सान को लेकर किसी भी प्रदर्शनकारी से कोई जुर्माना वसूल नहीं किया गया.

उत्तर प्रदेश

बात सिर्फ़ हरियाणा की नहीं है. पिछले कुछ सालों में हरियाणा सहित देश के कई राज्यों में भी काफ़ी हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए जिनमें जान और माल- दोनों का बहुत नुक़सान हुआ. इसमें मध्य प्रदेश के मंदसौर में हुआ किसानों का आंदोलन भी शामिल है.

ये बात वर्ष 2017 की है और इस दौरान पुलिस को गोली भी चलानी पड़ी थी जिसमे 6 किसान मारे गए थे. जमकर हुई हिंसा में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़पों के दौरान बीस से ज़्यादा वाहनों को जलाया गया और रेल की पटरियां भी उखाड़ी गई थीं.

मध्य प्रदेश सरकार के सूत्रों का कहना है कि इस प्रदर्शन के बाद किसी भी आंदोलनकारी के ख़िलाफ़ नुक़सान की भरपाई की कोई कार्रवाई नहीं की गई.

उसी तरह हरियाणा के पंचकूला में अगस्त 2017 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख बाबा राम रहीम को एक अदालत ने बलात्कार के आरोपों का दोषी पाते हुए उनकी गिरफ़्तारी के आदेश दिए लेकिन, जब पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करने डेरा पहुंची तो उनके समर्थकों ने जमकर हंगामा मचाया. पुलिस-प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में तब 40 लोग मारे गए थे.

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने बड़े पैमाने पर हुए संपत्ति के नुक़सान का संज्ञान लेते हुए सरकार को आदेश दिया कि हिंसा में हुई क्षति की भरपाई प्रदर्शनकारियों से की जाए. नुकसान के पैसे उन्हीं से वसूले जाएँ.

हरियाणा सरकार ने नुक़सान की भरपाई के लिए डेरा की संपत्ति की कुर्की ज़ब्ती कर इस रक़म को वसूला. मतलब ये कि प्रदर्शन में शामिल किसी भी आरोपी से कोई रक़म न वसूली गई और ना ही कोई नोटिस भेजा गया.

जयपुर में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं, “पिछले 13 साल में आरक्षण को लेकर गुर्जर समुदाय के लोग कई बार सड़कों पर आए, रास्ते जाम किए गए. इसमें सबसे ज़्यादा क्षति रेलवे को वहन करनी पड़ी, उसे करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ.”

राजस्थान पुलिस के अनुसार, किसी मामले में नुकसान की प्रदर्शनकारियों से वसूली की कोई जानकारी नहीं है.

कोर्ट ने क़ानून बनाने की सुझाव भी दिया

गुर्जर आंदोलन के शुरुआती दौर में लंबे समय तक उनके प्रवक्ता रहे डॉ रूप सिंह कहते है, “शुरुआत में हुकूमत इसे क़ानून-व्यवस्था की समस्या समझ कर हालात से निबटती रही. पर यह दरअसल ग़रीबी, बेरोज़गारी और असमानता से पैदा हुई समस्या थी.”

राज्य में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (सीआइडी) बीएल सोनी कहते हैं कि आंदोलन के सम्बन्ध में कुल 781 मुक़दमे दर्ज किए गए थे जिनमें से तीन सौ के क़रीब वापस भी ले लिए गए थे. लेकिन गंभीर प्रकृति के मामलों को वापस नहीं लिया गया.

वे कहते हैं कि नुक़सान की वसूली का कोई मामला सामने नहीं आया. इन सब प्रदर्शनों के मद्देनज़र उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं.

नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा में संपत्ति के नुक़सान की भरपाई प्रदर्शनकारियों से करने के सरकार के फ़ैसले की अलग-अलग तरीक़े से व्याख्या की जा रही है.

वैसे तो प्रदर्शनकारियों से भरपाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने अलग अलग निर्देश दिए हैं, अदालतों ने केंद्र सरकार को इस सम्बन्ध में क़ानून बनाने का सुझाव भी दिया है.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2007 में सेवानिवृत जज के टी थामस और वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन की अलग-अलग समिति बनाई थीं जिसने हिंसक प्रदर्शनों के दौरान होने वाले नुक़सान की भरपाई को लेकर कई सुझाव भी दिए थे.

उत्तर प्रदेश
Pic: BBC

पुलिस से नुक़सान की भरपाई कौन करेगा?

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रह चुके प्रकाश सिंह का कहना है कि यूपी में नुक़सान की भरपाई के लिए प्रदर्शनकारियों से जुर्माना वसूलने का जो आदेश दिया है वो सबके लिए सबक़ लेने वाली बात है. प्रकाश सिंह को जाट आंदोलन के बाद जांच का ज़िम्मा दिया गया था औरअपनी रिपोर्ट में उन्होंने प्रदर्शनकारियों से हर्ज़ाना वसूल करने की बात कही थी जिसे सरकार ने नहीं माना.

वे कहते हैं कि सरकार ने जब इस सम्बन्ध में कोई ठोस क़ानून नहीं बनाया तो राज्य सरकारों के लिए समय समय पर उच्च न्यायालयों या सुप्रीम कोर्ट के निर्देश काफ़ी हैं.

वहीं भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी और मानव अधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर कहते हैं कि ये कार्रवाई एकतरफा है जबकि क़ानून के सामने सभी को अपना पक्ष रखने और ख़ुद को निर्दोष साबित करने का मौक़ा मिलना चाहिए.

इसके अलावा उनको लगता है कि “उत्तर प्रदेश में जो कुछ सरकार ने किया वो नागरिकों की समानता के हिसाब से नहीं है. मंदर कहते हैं कि सरकार का व्यवहार पारदर्शी और बराबरी वाला होना चाहिए.”

वे कहते हैं, “कश्मीर में अगर विरोध प्रदर्शन होता है तो उसको अलग तरीके से देखा जाए और दूसरे प्रांतों में समाज के अलग अलग तबक़ों के प्रदर्शनों को अलग तरीके से देखा जाना और उनसे निपटना भी ग़लत है.”

मंदर कहते हैं, “उत्तर प्रदेश सरकार इस मुद्दे पर खामोश है कि जिन लोगों की संपत्ति का नुक़सान सरकारी अमले या पुलिस ने किया है उसकी भरपाई कैसे होगी?”

Source: BBC

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