Share
मोदी सरकार की लगातार गलतियों की वजह से बुरी कगार पर है देश की अर्थव्यवस्था…

मोदी सरकार की लगातार गलतियों की वजह से बुरी कगार पर है देश की अर्थव्यवस्था…

पुरे देश का यह मन्ना है की Modi सरकार नें देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करदिया है , पांच सालों में कभी नोटबंदी तो कभी GST जैसे Modi सरकार के फैसलों से देश अभी तक उठकर खड़ा नहीं हो पाया है। इसे में 2014 के चुनाव में PM Modi नें देश की अर्थव्यवस्था को लेकर कोई टिपण्णी की होगी तब पूर्व केंद्र मंत्री P . Chitambaram  नें  इन शब्दों से इसका जवाब दिया था कि,

‘अर्थव्यवस्था के बारे में Modi का ज्ञान बस इतना है कि उसे किसी डाक टिकट के पीछे लिखा जा सकता है।’

यह एक उचित टिप्पणी थी, लेकिन उनका कहना है कि मैं मानता हूं कि Modi ने इस टिप्पणी के लिए मुझे कभी माफ नहीं किया! यह कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन समय ने यह साबित कर दिया है कि मैं सही था।

Modi सरकार के पांच साल के कार्यकाल के अंत में हम सरकार के कृत्यों और उसकी नाकामियों को लेकर लंबा आरोप पत्र तैयार कर सकते हैं। इस सूची में, मेरे दृष्टिकोण में, अर्थव्यवस्था का प्रबंधन शीर्ष पर होगा। कुप्रबंधन के लिए जो चीजें जिम्मेदार हैं, उनमें शामिल हैं, (1) Macro Economics (समष्टि अर्थशास्त्र) से प्रधानमंत्री का अपरिचित होना और इसे जानने के प्रति उनकी अनिच्छा। (2) वित्त मंत्री की यह पूर्वानुमान लगाने की अक्षमता कि नीतिगत बदलावों पर व्यापार, कारोबार, निवेशकों और उपभोक्ताओं का व्यवहार कैसा होगा। और (3) अर्थशास्त्रियों के प्रति सरकार की उपेक्षा और नौकरशाहों पर जरूरत से अधिक भरोसा।

एक अलग लीग

एक राज्य सरकार को चलाने और भारत में शासन करने में बहुत अंतर होता है। किसी मुख्यमंत्री को विनिमय दर या चालू खाता घाटा या मौद्रिक नीति या बाह्य घटनाक्रम (मसलन, अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर या ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध) को लेकर परेशान नहीं होना पड़ता। यदि कोई मुख्यमंत्री राज्य के राजस्व का प्रबंधन ठीक से करता है, खर्च को नियंत्रित रखता है, केंद्र सरकार से बड़ा अनुदान हासिल करता है और पर्याप्त निजी निवेश आकर्षित करता है, तो आर्थिक प्रबंधन को लेकर वह अच्छा प्रदर्शन करेगा। बिना किसी औपचारिक शिक्षा वाले अनेक जमीनी मुख्यमंत्री अपने राज्य में अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के लिए प्रशंसा अर्जित कर चुके हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था का प्रबंधन एक अलग तरह का मामला है। वित्त मंत्री नियुक्त किए जाने पर अनेक सफल मुख्यमंत्री अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए। दूसरी ओर डॉ मनमोहन सिंह जिनके पास कोई राजनीतिक अनुभव भी नहीं था, मैक्रो इकोनॉमिक्स में अपनी विद्वता और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों से लगातार संपर्क में रहने की इच्छा के कारण एक शानदार वित्त मंत्री साबित हुए। डॉ सिंह के बिना न तो उदारीकरण होता और न ही कई ऐसे सुधार होते जिन पर आगे बढ़ा जाता।

Source: Livemint

क्या है 2014-2019 का निराशाजनक रिपोर्ट कार्ड:

वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले आर्थिक मामलों के विभाग ने पांच वित्तीय वर्षों की समाप्ति के बाद एक रिपोर्ट कार्ड तैयार किया है। मेहरबानी करके रिपोर्ट में नोटबंदी के बाद 2016-17 से शुरू होने वाले वर्षों के आंकड़ों को प्रमुखता से दर्शाया गया है। इस रिपोर्ट की प्रमुख सुर्खियों पर नजर डालते हैं:

 

  1. 2016-17, 2017-18 और 2018-19 इन तीन वर्षों के दौरान जीडीपी की वास्तविक विकास दर 8.2 फीसदी से गिरकर 7.2 फीसदी और फिर और गिरकर सात फीसदी रह गई। 2018-19 की चौथी तिमाही में अनुमानित विकास दर 6.5 फीसदी थी।
  2. सकल वित्तीय घाटा इन वर्षों में जीडीपी का क्रमशः 3.5, 3.5 और 3.4 फीसदी रहा। 2018-19 के आंकड़े को लेकर संदेह है, क्योंकि पुनरीक्षित अनुमान के मुताबिक कर संग्रह में 11 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
  3. पूंजीगत व्यय स्थिर है: 2018-19 में यह जीडीपी का 1.7 फीसदी था और 2015-16 में यही स्थिति थी।
  4. जीडीपी डिफ्लेटर (अपस्फीतिकारक) जो कि महंगाई का छद्म कारक है, 3.1 फीसदी से बढ़कर 4.2 फीसदी हो गया।
  5. चालू खाता घाटा 0.6 फीसदी बढ़कर जीडीपी के 1.9 फीसदी से 2.6 फीसदी हो गया।
  6. निजी खपत व्यय और सरकारी खपत व्यय स्थिर रहे।
  7. नियत निवेश दर जीडीपी के 28.2 फीसदी और 28.9 फीसदी के बीच स्थिर रही, और यह 2011-12 के दौरान हासिल की गई 34.3 फीसदी की उच्च दर से काफी कम है।
  8. कृषि क्षेत्र की हताशा जीवीए (सकल मूल्य वर्धन) में आई तेज गिरावट में साफ प्रतिबिंबित होती है, जिसकी दर 6.3 फीसदी से गिरकर 5.0 फीसदी और फिर गिरकर 2.7 फीसदी रह गई।
  9. उद्योग जगत में जीवीए की वृद्धि स्थिर रही; सेवा क्षेत्र में जीवीए में वृद्धि में गिरावट देखी गई जो कि 8.4 से गिरकर 8.1 फीसदी और फिर 7.4 फीसदी रह गई।
  10. पोर्टफोलियो निवेश का सकल प्रवाह 2018-19 में नकारात्मक हो गया।
DNA India

बार- बार हुई ग़लतियाँ 

जब अर्थव्यवस्था के प्रबंधन की जिम्मेदारी नौसिखिया लोगों के या निरंकुश लोगों के हाथों में होगी, तो उसके हश्र भी जल्द सामने आएंगे। नोटबंदी इसका शास्त्रीय उदाहरण है। किसी भी अर्थशास्त्री ने अपनी स्नातक की डिग्री को दांव पर लगाकर प्रधानमंत्री को व्यवहार में आ रही 86 फीसदी मुद्रा को अवैध घोषित करने की सलाह नहीं दी होगी, लेकिन ऐसा किया गया। चूंकि अरुण जेटली ने कभी भी सार्वजनिक तौर पर जिम्मेदारी नहीं ली, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि यह फैसला पूरी तरह से प्रधानमंत्री का था। Modi ने इसका श्रेय तो लिया, लेकिन उन्होंने यह स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया, एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु  एवं मध्यम उद्योग) को नेस्तनाबूद कर दिया, नौकरियां खत्म कर दीं और कृषि क्षेत्र के संकट को और बढ़ा दिया।

नोटबंदी के बाद और गलत निर्णय लिए गए। मानव जाति के आर्थिक व्यवहार की बहुत कम समझ के साथ बजट तैयार किए गए, जीएसटी को खराब ढंग से तैयार कर हड़बड़ी में लागू किया गया, एनपीए के मुद्दे पर कठोर और फूहड़ ढंग से पेश आया गया,  अव्यावहारिक राजस्व लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सत्ता की ताकत का दुरुपयोग किया गया और गलत तरीके अपनाए गए और ढांचागत आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए नौकरशाही के त्वरित समाधान तलाशे गए।

BJP का झूठा अहंकार हवा हो चुका है। अर्थव्यवस्था की स्थिति के बारे में हमारी सबसे बुरी आशंका सच हो गई है। इसके अलावा केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा घोषित विकास दर (जिस पर अर्थशास्त्री पहले ही संदेह जता चुके हैं) घनी धुंध में लिपटी हुई है। NSSO जिसने पिछले पैंतालीस वर्षों में सर्वाधिक बेरोजगारी दर का खुलासा किया था, CSO द्वारा इस्तेमाल किए गए एमसीए 21 डाटा बेस की हवा निकाल दी है।

पता चला कि एमसीए 21 डाटा बेस की 36 फीसदी कंपनियां या तो निष्क्रिय थीं या फिर उन्हें तलाशा नहीं जा सका। भारत की अर्थव्यवस्था कई वर्षों से कमजोर स्थिति में थी। इसीलिए Modi ने कथानक को अर्थव्यवस्था से कहीं और ले जाने की कोशिश की। जो लोग आज 12 मई और 19 मई को मतदान करने वाले हैं, उनके लिए यह एक बड़ी चेतावनी है। इससे यह तो पक्का हो गया है की देश के कितने अच्छा दिन आये .

  • आज loksabha Elections 2019 का छटा चरण है जिसमे देश की राजधानी दिल्ली में भी मतदान होने है अब देखना होगी दिल्ली की जनता किसकी सरकार चुनेगी? 

Source: Amar Ujala

Leave a Comment